रुपया बाज़ार-निर्धारित हुआ
1991 के दोहरे अवमूल्यन के बाद भी भारत की विदेशी मुद्रा प्रणाली आधी-अधूरी थी — उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन प्रणाली (LERMS) के तहत एक हिस्सा बाज़ार-निर्धारित और एक हिस्सा नियंत्रित। 1993 में सरकार ने अंतिम कदम उठाया — दोनों दरें एकीकृत कीं और रुपये को चालू खाते के लेनदेन के लिए पूरी तरह परिवर्तनीय बनाया।
पहली बार स्वतंत्र भारत में रुपये का मूल्य सरकारी आदेश से नहीं, बाज़ार की माँग-आपूर्ति से तय होने लगा। एकीकरण के बाद डॉलर ₹31.37 पर स्थिर हुआ।
इस बदलाव का गहरा और स्थायी प्रभाव था। अब तेल, सोना, उर्वरक जैसे आयातित वस्तुओं की कीमतें सीधे वैश्विक बाज़ार और विनिमय दर से जुड़ गईं। जब रुपया कमज़ोर होता, आयात तत्काल महँगा हो जाता। यही कारण है कि भारत में सोने और पेट्रोल की कीमतें दो शक्तियों से एक साथ प्रभावित होती हैं — वैश्विक कमोडिटी बाज़ार और रुपया-डॉलर विनिमय दर।
1993 में कीमतें
USD/INR
₹30.49/$
मूल्य इतिहास देखें